Monday, March 10, 2008

सांस्कृति, संप्रेषण और अनुवाद

दिनांक :- ११/०३/०४
पेपर
नं. ७०४



सांस्कृति, संप्रेषण और अनुवाद

प्रस्तावना : -


संस्कृति और संप्रेषण समाज के महत्व पूर्ण अंग है जिसके बिना कोई भी समाज पूर्ण नहीं हो सकता। संस्कृति समाज की पहचान होती है। " डे फेस्टिवल " की संस्कृति ने भारतीय संस्कृतिक मूल्यों को जड़ से हीला कर रखा दिया । तो दूसरी ओर संप्रेषण साधनों के आविष्कारों ने सजीव संप्रेषक को निर्जीव संप्रेषक में बदल दिया हैं। समाज में संप्रेषकों को भी संस्कृतिक महत्व होता था जिसका अंत हो चूका हैं। मानव का संपूर्ण व्यवहार और आचरन ही उसकी "संस्कृति" है । इन शब्दों में उसकी सभ्यता समाहीत है, लेकिन किसी की असभ्यता भी उसकी "संस्कृति" हो सकती है ।
जैसे हम Teenage Culture, Male Culture, Female culture, working class Culture, Bakers Culture, Culture of City, State, and Culture of Nation के रुप मे देख सकते है।
मानव जाति के संस्कृतिक प्रथाओं एवं मान्यताओं का भाषिक विश्लेषण मानव विज्ञान में अवधारना के रुप मे किया जाता हैं। भाषा का अध्यन बिना उसकी संस्कृति को जाने करना अस्मभव है ।
संदेशों को संकेतो द्वार व्यक्त करने की प्रक्रिया संप्रेषण है।
संस्कृतिक सम्प्रेषण की स्थिति को उदरीकरण पूर्व एवं उदरीकरण के बाद की परस्थिति इन दो भागों में विभाजित कर देख सकते हैं। प्रमुख रुप से हम विचार कर सकते है, कि उदारीकरण पूर्व समाज में रीति-रिवाज, उत्सव, त्योहार, देव–देवता, उपासनाविधि आदि में कुछ बदलाव दिखाई देता, तो कई बार नई धारणाओं का भी जन्म होता था। उदारीकरण और जागतिकरण के पश्चात रहन-सहन, खान-पान, आचार-विचार, काम आदि में मूल रुप से भेद दिखाई देता है लेकिन नई सांकृतिक संकल्पनाओं का निर्माण नहीं हो पा रहा है। भारत जैसे सांस्कृतिक देश में जहां महिनों में नई संस्कृतिका निर्माण होता वहीं आज पाश्चात्य देशों की संस्कृति से प्रभावित हो रहा है। जिससे केवल समाज को ही नहीं बल्कि पर्यावरण पर भी इसका विपरीत परिणाम हो रहा हैं।

"सम्प्रेषण" के लिए भाषा ही सम्प्रेषण का एक मात्र साधन नहीं है, हम शारिरीक चेष्टाओं, मुख मुद्राओं एवं सहज वाचिक उत्तेजनाओं से भी अपने भावों, विचारों को सम्प्रेषित करते है। लेकिन शारिरीक क्रियओं से होने वाले सम्प्रेषण को सम्प्रेषण की भाषा नहीं कह सकते। सम्प्रेषण के लिए यह आवश्यक है कि उत्तेजना के संचरण के द्वार श्रोता में प्रतिक्रिया उत्पन्न हो। सूचना का यथार्थ रुप में संवहन ही सम्प्रेषण है। सम्प्रेषण को प्रमुख दो विभागों में देखा जाता हैं।

१. ध्वनि रहित सम्प्रेषण २. ध्वनि सहित सम्प्रेषण ।

इन दो प्रकारों की समस्याएं भी अलग-अलग हो सकती है । ध्वनि सहित संप्रेषण में मुख्य रुप से मनुष्य के वाचिक संप्रेषण को देख सकते है । ध्वनि रहित संप्रेषण में लिखित रुप को, या शारिरीक क्रियाओं को देख सकते हैं।

संस्कृतिक संप्रेषण में अनुवाद के पक्ष : - संस्कृतिक अवधारना को पूर्ण रुप से समझ ने और संप्रेषित करने के लिए निम्न पक्ष अधिक सहायक होंगे।

१. ईश्वर की संक्लपना

२. कला और नृत्य

३. विवाह, मृत्यु संस्कार और प्रसुति पूर्व एंव बाद के संस्कार (Maternity system)

४. संस्कृतिक अर्थ की समानता ( स्थान के संर्दभ में )

५. सांस्कृतिक ध्वनि

६. राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियाँ

७. विचारधारा

८. सांस्कृतिक उत्सव (कार्यक्रम)

९. अनुवाद की संकल्पना

संस्कृतिक संप्रेषण के लिए समाज एवं पाठ की इन गतिविधियों को ध्यान में रखना आवश्यक होगा। स्थान से तात्पर्य यह है कि संस्कृतिक परिवेश की भौगोलिक परस्थिति।

संस्कृति और संप्रेषण के सेतू : - "भाषा" संस्कृतिक संप्रेषण का सर्वाधिक महत्व पूर्ण साधन है जिसके बिना मानव सफल संप्रेषण ना कर पाता था ना कर पाएगा। एक भाषा दूसरी भाषा से कुछ संस्कृतिक शब्द लेती है, तो कुछ संकृतिक शब्द अन्तरराष्ट्रीय होते है, जिनका अनुवाद करने आवश्यकता नहीं होती । कहावते, मुहावरे, लोकोक्तियाँ भी संस्कृतिक संप्रेषण के स्त्रोत है। समाज में
संस्कृतिक सम्प्रेषण को साहित्य ने सर्वाधिक सहायता प्रदान की है। आज भी सहित्य ही एक ऎसा माध्यम है जिससे संकृतिक मूल्यों का पूरी निष्ठा के साथ आदान-प्रदान होता हैं। फिल्म, व्यवसाय, नाटक, गीत, धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन, आदि को भी संस्कृतिक सम्प्रेषण के साधनों के रुप में देखा जा सकता हैं । लेकिन इन माध्यमों की एक विशिष्ट सीमा होती है। संप्रेषण साधनों के आविष्कारों के कारण आज संप्रेषण साधन पूर्ण रुप से बदल गए है। जहां मानव ने संप्रेषण के साधन के रुप मे कबूतर, आदमी और जानवरों का उयोग किया तो आज मोबाईल, कंपूटर, इंटरनेट, फोन, दूरदर्शन, रेडियो, एफएम आदि का उपयोग किया जा रहा हैं। यह सबसे महत्व पूर्ण और सोचनिय विषय है कि इन माध्यमों से संप्रेषण अधिक गति से होता है लेकिन सांस्कृतिक संप्रेषण प्रभावि रुप से नहीं होता। जिसके कारण संस्कृतियों का महत्व भी कम होता जा रहा है।

संस्कृतिक अनुवाद में संप्रेषण की समस्याएं : - संस्कृतिक समस्याऎं सहित्यिक (लिखित)' मौखिक और व्यवहारीक रुप में आने वाली समस्याऎं होती हैं जिनकी समस्याएं संप्रेषण में भी समान रुप से दखी जा सकती है । जैसे : - किसी एक भाषा में किस वस्तू, रंग, या स्थान को धार्मिक रुप से महत्व होगा यह नहीं समझ सकते । तो कई बार दूसरी भाषा सिखने वाला व्यक्ति आदर सूचक शब्द, लिंग, वचन में मौखिक रुप से उच्चारण में गलतियां करता है। जिससे संप्रेषन की प्रक्रिया मे समस्याऎं निर्माण होती है। संप्रेषण प्रक्रिया का प्रकार भी संप्रेषण सफल करने में महत्व पूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें अगर दूविधा उत्पन्न हो जाए तो संप्रेषण में समस्या निर्माण हो सकती है। संकृतियों का सामाज पर आधिक तर परिणाम इस लिए होता है कि संकृति मनुष्य में संवेदना, भाव-भावना निर्माण करने का महत्व पूर्ण कार्य करती है। संप्रेषण प्रक्रिया सफल होने के लिए उत्तेजना के संचरण के द्वार श्रोता में प्रतिक्रिया उत्पन्न होना आवश्यक होता है लेकिन एक संकृति का संवहन उसी रुप में होना संभव नहीं हो पाता एसी परस्तिथि में संप्रेषक को दोष दिया जाता है । विश्वमैत्रि और विश्वबंधूत्व की संकल्पना के कारण दूसरी संस्कृति को जानने के लिए उस परिवेश में रहाना लाभदायक होगा या फिर उस संस्कृति की भाषा या साहित्य को पूर्ण रुप से ज्ञात करना होगा । समाज और संस्कृतियों में हो रहा विकास । अन्य संस्कृतियॊं की रीति –रीवाजों को स्विकार्य - अस्विकार्य की स्थिति भी समाज में निर्माण हो सकती है।


संस्कृतिक अनुवाद में संप्रेषण की समस्याऒं का समाधान : -

उदारीकरण और जागतिकाण पूर्व दो संकृतियों में अधिक असमानताएं होती थी जिसके चलते संप्रेषण में काफी समस्याएं उत्पन्न होती थी। उदारीकरण और जागतिकाण के बाद यह दूरी काफी कम हो चूकि है। इस स्थिति की ओर अनुवादक को विशेष ध्यान देना होगा। सांकृतिक शब्दों, मुहावरों, कहावतों को अधिकतर पाद टिप्पणी के द्वारा स्पष्ट किया जाता हैं। लेकिन कुछ विद्बानों का मानना है कि अगर ऎसे शब्दों की जगह ही स्पष्टिकरण दिया जाए तो पाठक को अधिक सहायता हो सकती है। पाद टिप्पणी के कारण पाठक की पठन प्रक्रिया में अवरोध आकर पाठक की पठन प्रक्रिया की लयात्मकता में बाधा उत्पन्न हो सकती है।

संप्रेषण के परिमाण (size of communication ) के कारण भी समस्याएं निर्माण होती है। आधुनिक युग की ओर देखा जाए तो संप्रेषण के लिए यह अधिक लाभ दायक होगा की पाठक जिस संस्कृति को अधिक समझता हो, अथवा उसके परिवेश को ध्यान मे रखते हुए संदेश को संप्रेषित करें। इस विधि के कारण संप्रेषक को सूचना ( संदेश ) अधिक प्रभावि रुप से संप्रेषित होगा। सूचना का प्रभाव संप्रेषण शैली अधिक निर्भर होता है इस लिए संप्रेषण शैली पर भी अधिक ध्यान होना चाहिए । इसी के साथ संप्रेषण में सहजता उत्पन्न करना, संस्कृतिक एकरुपता निर्माण करना, दो संस्कृतियों की तुलना कर कर असंदिग्धता दूर करना और पाठ का पुन:निरिक्षण करना आदि से संप्रेषण अधिक सफल होगा ।

उपसंहार : - एक संकृति का दूसरी संस्कृति में संप्रेषण होने से केवल
उस संस्कृति की आलोचना होती है बल्कि उस समाज और संस्कृति का विकास भी होता है। संकृतिक समस्याओं का पूर्ण रुप से समाधान
होना तो कदापी संभव नहीं है। इसे ध्यान में रखते हुए अगर संप्रेषण के अन्य साधनों का अधिक से अधिक विकास किया जाए तो सांकृतिक संप्रेषण अधिक प्रभावि रुप से हो पाएगा। जैसे : - एक साधन "संकेत" है। देशों को संकेतो द्वार व्यक्त करने की प्रक्रिया संप्रेषण है यह संकेत कुछ भी हो
सकते है खाने के लिए संकेत रुप में हम पाचों उगलियाँ एक साथ मिला कर
हाथ को ओठों तक ले जाते हैं। लगभग
अधिकतर भाषाओं में यही संकेत हैं।
विश्वमें कई हजार सांकृतिया हैं लेकिन अनुवाद ही एक एसी कड़ी हो जो समय दूरी और भेदभाव को खतम कर एकता
पैदा कर सकता है। भाषांतरकार और अनुवाद के बंध में यह कह सकते हैं कि जो अनुवाद संप्रेषण परक नहीं हो सकता वह अनुवाद संकृति का वाहक कभी नही हो
सकता।


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संदर्भ
ग्रंथ : -

.Theory and practice of Translation - Dr.Y.C.Bhatnagar

. भाषा विज्ञान - महाविरसरन
जैन ( पेज११६ -११७ )

.अनुवाद कला : सिद्धांत और कला

- कैलाश चन्द्र भाटिया

. अनुवाद क्या है ?

- संपादन - राजमल बोरा

संदर्भ पत्रिका

. समयांतर ( पत्रिका ) अनुवाद

  1. अनुवाद शतक ( page – 313 - 319 )

    Cultures Through Translation Sharad Chandra

  1. Babei Cultural Translation ( page – 3 - 5 ) Diri I.Teilanyo

इंटरनेट वेब साईट : -

. http://www.rennert.com/translations/services_culturalconsult.htm

. http://en.wikipedia.org/wiki/Cross-cultural_communication

. enjamins.com/jbp/series/Target

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