Tuesday, March 22, 2011

“हिंदी व्याकरण का इतिहास” ‘डॉ.अनंतनाथ चौधरी’ के पुस्तक की समीक्षा और व्याकरण की परंपरा


हिंदी व्याकरण का इतिहास डॉ.अनंतनाथ चौधरीके पुस्तक की समीक्षा

और व्याकरण की परंपरा

कांबले प्रकाश अभिमन्यु, माधव गोपाल, जे.एन.यू.,नई दिल्ली-६७

व्याकरण लेखन की आवश्यकता

किसी भी भाषा को अच्छी तरह से सीखने और समझने के लिए आवश्यकता होती है उस भाषा के विविध घटकों को समझना। जिसमें ध्वनि तत्वों से लेकर भाषा में सामान्य से सामान्य भूमिका निभाने वाले घटकों को भी सीखना जरुरी होता है। जिनके बदलने से अर्थ में परिवर्तन नहीं होता। लेकिन भाषा में उनका अपना एक स्थान होता है, और वह कई बार उस भाषा की विशेषता भी साबित होता है। जैसे-’संस्वन’(Allophone) जिनके बदलने से अर्थ नहीं बदलता लेकिन संस्वनों का प्रत्येक भाषा में विशिष्ट स्थान होता है। इसी प्रकार भाषा में कुछ ऐसे महत्वपूर्ण घटक\तत्व होते हैं जिनके बिना उस भाषा को सीखना और समझना बिल्कुल संभव नहीं हो पाता। जैसे – व्याकरण, ध्वनि और अर्थ। यह भाषा के वे महत्वपूर्ण अंग हैं जिनके बिना कोई भाषा सीखना संभव नहीं। देखा जाए तो भाषा का हर तत्व महत्वपूर्ण होता है परंतु कुछ तत्वों को गौण रूप में भी रखा जा सकता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो व्याकरण भाषा का वह तत्व\घटक है जिसके बगैर भाषा पूर्ण नहीं हो पाती। इसीलिए प्रत्येक भाषा का अपना एक व्याकरण होता है। जिस प्रकार भाषा स्थिर नहीं होती उसी प्रकार भाषिक अयध्यन में व्याकरण भी स्थिर नहीं होता। उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन अवश्य होता रहता। इसमें कुछ चीजें जुड़ती रह्ती हैं तो कुछ चीजों को निकाल दिया जाता है। यह प्रक्रिया व्याकरणशास्त्र में होने वाले निरंतर अध्ययन के द्वारा घटित होती रहती है। जिसके कारण व्याकरण की भी कई पुस्तकें प्रकाशित होती हैं। कुछ विद्वानों के नए-नए व्याकरणिक सिद्धातों के कारण भी यह कार्य होता है। इसलिए प्रत्येक भाषा के व्याकरण का एक इतिहास है कि किस प्रकार उस भाषा के व्याकरण में परिवर्तन होता रहा है। जिस प्रकार संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, अंग्रेजी, हिब्रु, लैटीन, जर्मन, फ्रेंच आदि भाषाओं के व्याकरण का इतिहास रहा है उसी प्रकार हिंदी व्याकरण का भी इतिहास रहा है। व्याकरण का इतिहास केवल उस भाषा का विवेचन करने के उद्देश्य से नहीं लिखा जाता बल्कि उस भाषा की स्वीकार्यता और उस भाषा की विशेषताओं का इतिहास क्या रहा है यह जानने के लिए महत्वपूर्ण होता है।

भाषा को सीखने के कुछ नियम होते हैं लेखिम रुप, श्रौतिक रुप एवं मौखिक रुप इनमें एक साम्यता है इन तीनों रुपों में व्याकरण एक ही होता है। जिस भाषा को सिखना हो उस भाषा का व्याकरण इन तीनों रुपों में समान रुप में उपयोग लाया जाएगा। व्याकरण का एक अलिखित नियम यह भी है कि कोई समाज किसी व्याकरणिक संरचना को अनुमति देता है और उस संरचना का व्याकरण में समावेश होता है तो समाज के लोगों को उसे परिवर्तित करने की अनुमती नहीं होती। व्याकरण, भाषा और समाज एक दूसरे को निरंतर प्रभावित करते रहते हैं। संक्षिप्त रूप से देखा जाए तो व्याकरण भाषा के वह नियम होते हैं जो समाज में व्यवहार के लिए स्वीकृत किए गए हों। भाषा के उसी नियमों के अनुसार ही उस समाज के लोगों को व्यवहार करना होता है। फिर वह लिखित रुप हो, या मौखिक। व्याकरण उस (गति का) नियामक है, न अवरोधक ही। हाँ, सहस्रों वर्ष बाद जब कोई भाषा किसी दूसरे रूप में आ जाती है, तब वह (पुराने रूप का) व्याकरण इस (नए रूप) के लिए अनुपयोगी हो जाता है। ऐसे समय पर इस (नए रूप) का पृथक व्याकरण बनेगा। वह पुराना व्याकरण तब भी बेकार न हो जाएगा; उस पुरानी भाषा का (भाषा के उस पुराने रूप का) यथार्थ परिचय देता रहेगा। यह साधारण उपयोगिता नहीं है।[1] इस प्रकार से देखा जाए तो भाषा समाज का वह अंग बना हुआ है जिसके बगैर समाज पूर्ण नही होता उसी प्रकार व्याकरण भाषा का वह अंग है जिसके बगैर भाषा पूर्ण नहीं होती। जिस प्रकार समाज को भाषा की आवश्यकता होती है उसी प्रकार भाषा को व्याकरण की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता को देखते हुए व्याकरण शास्त्री व्याकरण को अधिक से अधिक समृद्ध करने का प्रयास करते हैं। इस व्याकरण की समृद्धि का इतिहास ही एक प्रकार से व्याकरण का इतिहास है। हम हिंदी व्याकरण का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि हिंदी में यह परंपरा बहुत समृद्ध नहीं रही। आधुनिक व्याकरण परंपरा भी अंग्रेजी व्याकरण परंपरा के आधार पर ही चल रही है।

पुस्तक परिचय - 19वीं शताब्दी को ऐतिहासिक और तुलनात्मक भाषाशास्त्र का युग माना जाए तो 20वीं शताब्दी को वर्णनात्मक तथा संरचनात्मक भाषाविज्ञान का स्वर्णयुग कहना गलत नहीं होगा। और आज 21वीं शताब्दी में भाषाविज्ञान ने भाषा प्रौद्योगिकी(Computational Linguistics) का रुप ले लिया है। जिस समय भाषाविज्ञान के क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर बदलाव हो रहे थे उसी समय हिंदी भाषाविज्ञान और व्याकरणशास्त्र भी अपनी जड़े जमा रहा था। लेकिन हिंदी साहित्य के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य हो रहा था। जिसके चलते हिंदी व्याकरणशास्त्र की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा था। इसी कार्यकाल में हिंदी साहित्य का इतिहास भी रचा जा रहा था। इससे प्रभावित होकर हिंदी साहित्य के विद्वानों ने हिंदी साहित्य के इतिहास के क्षेत्र में तो कई ग्रंथ लिखे लेकिन किसी ने हिंदी व्याकरण के इतिहास के संबंध में कोई किताब लिखने का प्रयास नहीं किया। यह काम जितना कठिन था उससे कहीं ज्यादा वैज्ञानिक और साहसभरा था। इस कार्य को पूरा करने के लिए केवल हिंदी के ही नहीं बल्कि पाश्चात्य जगत के व्याकरण की और ऐतिहासिक व्याकरण की जानकारी होना भी अत्यंत आवश्यक था। इस कार्य को पूरा किया डॉ.अनंतनाथ चौधरी के ग्रंथ हिंदी साहित्य का इतिहास ने। लेकिन आज भी यह पुस्तक हिंदी व्याकरण क्षेत्र में अनदेखी ही रही है। इस पुस्तक का विभाजन प्रमुख रुप से चार भागों में किया गया है।

1. संस्कृत व्याकरणशास्त्र की परंपरा

2. प्राकृत, पालि एवं अपभ्रंश व्याकाण की परंपरा

3. पाश्चात्य व्याकरण की परंपरा

4. हिंदी व्याकरण का इतिहास

यह विभाजन अत्यंत सटीक एवं शास्त्र शुद्ध पद्धति से किया गया है। क्योंकि पुस्तक का प्रकाशन काफी पहले हुआ है जिसके कारण 1966 के बाद के कार्य पर प्रकाश नहीं पड़ सका। अगर छुटे हुए काल की पूर्ति के लिए हिंदी व्याकरण का इतिहास फिर से लिखा जाए तो संदर्भ रुप में इस पुस्तक से अधिक उपयोगी पुस्तक कोई और नहीं होगी। इस पुस्तक में हिंदी व्याकरण के साथ ही संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और पाश्चात्य व्याकरण का इतने विस्तार से विवेचन किया गया है कि छोटे से छोटे वैयाकरण और भाषाशास्त्री का परिचय आपको इस पुस्तक में मिल जाएगा। हिंदी व्याकरण के इतिहास की परंपरा को पाँच भागों में विभाजित किया गया है। 1. आरंभ काल 2.विकासकाल 3.उत्थान काल 4.उत्कर्ष-काल और 5.नवचेतना-काल। इनका कार्य डॉ.ज.म.दीमशित्स(सन 1966) तक आकर समाप्त हो जाता है। सन 1966 के बाद हिंदी व्याकरण में कई महत्वपूर्ण कार्य हुए है अत: इन कार्यों को हिंदी व्याकरण के इतिहास में समाविष्ट करने के लिए केवल इस पुस्तक को पुन: संपादित करने की आवश्यकता है बल्कि इस पर हिंदी व्याकरण के इतिहास की बहस छिड़ना जरुरी है। इसका एकमेव कारण यह भी है कि संस्कृत व्याकरण की सर्वाधिक सशक्त परंपरा होने के बावजूद संस्कृत सीखने वालों की संख्या कम होती जा रही है। हिंदी पर जिस प्रकार अंग्रेजी और अन्य भाषा का प्रभाव दिखाई दे रहा है उससे प्रभावित न होकर हिंदी भाषा के व्याकरण की बहस की जाए। जो काम डॉ.अनन्तनाथ चौधरी ने बड़ी खूबी से इस किताब में किया है। डॉ.अनन्तनाथ चौधरी द्वारा इस पुस्तक के लिए किए गए कार्य का विस्तृत विवेचन किया जा रहा है।

भारतीय व्याकरण लेखन की शुरूआत:- यह एक ऐतिहासिक एवं सर्व सम्मत मत है कि “भाषा के शास्त्रीय अध्ययन एवं व्याकरण निर्माण की परम्परा का प्रारंभ एवं विकास सर्वप्रथम भारत वर्ष में हुआ।”(पृष्ठ-२) जिसे पाश्चात्य वैयाकरणों ने भी माना है। लेकिन बहस इसपर हो रही है कि व्याकरण शास्त्र का अध्ययन कहाँ से शुरू होता है। भारतीय विद्वानों का मानना है कि “वैदिक मन्त्रों के उच्चारण को शुद्ध तथा भाव को बोधगम्य बनाये रखने के लिए उनके द्वारा जो अनेक विध प्रयत्न हुए, उन्हीं प्रयत्नों के समन्वित प्रतिफल के रुप में व्याकरणशास्त्र का उद्भव हुआ। लेकिन पाश्चात्य वैयाकरणों का मानना है कि व्याकरणशास्त्र के निर्माण की यथार्थ प्रक्रिया का प्रारम्भ पदपाठ की नियुक्ति के साथ हुआ तथा शिक्षा, प्रतिशाख्य एवं निरुक्त के विभिन्न सोपानों को पार करती हुई अन्त में वह प्रक्रिया सर्वांगीण रुप में प्रस्थापित करने में समर्थ हो सकी। तो कुछ भारतीय वैयाकरण ब्रम्हा, शिव और बृहस्पति के मत्रों के उच्चारण से व्याकरण की उत्पत्ति मानते हैं। इस बहस के बीच यह स्पष्ट होना जरुरी है कि व्याकरण पद जिस धातु से व्युत्पन्न है, उसका मूल अर्थ में सर्वप्रथम प्रयोग यजुर्वेद(1877) में उपलब्ध होता है।(पृष्ठ-६) इसी के साथ “शब्दशास्त्र के लिए व्याकरण शब्द का प्रयोग रामायण, गोपथब्राह्मण, मुण्डकोपनिषद्, महाभारत आदि ग्रन्थों में मिलता है।”(पेज-७)

1. संस्कृत व्याकरणशास्त्र की परंपरा

आज पाणिनि व्याकरण से पूर्व लिखा कोई भी व्याकरणिक ग्रंथ उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद यह स्पष्ट रुप से कहा गया है कि पाणिनि प्रथम व्याकरणकार नहीं है। उनसे पहले भी कई वैयाकरण थे जिनके प्रमाण भी उपलब्ध है। स्वयं पाणिनि ने अपने “अष्टाध्यायी” में ऐसे दस वैयाकरणों को स्मृत(कोड) किया है। इसके बावजूद अन्य सतरह वैयाकरणों के होने के प्रमाण भी उपलब्ध है। 1. ब्रम्हा 2. शिव 3. बृहस्पति 4. इंद्र 5. वायु 6. भारद्वाज 7. भागुरि 8. पौष्करसादि 9. चारायण 10. काशकृत्स्न 11. शन्तनु 12. वैयाग्रवद्य 13. माध्यन्दिनि 14. रौढि 15. शैनिकि 16. गौतम, 17. व्यादि आदि। इन 17 वैयाकरणों के अतिरिक्त पाणिनि ने जिन वैयाकरणों को स्मृत किया है वे दस वैयाकरण इस प्रकार है 1. आपिशालि(आपिशल) 2. काश्यप 3. ग्यार्ग्य 4. गालव 5. चाक्रवर्मण 6. भारद्वाज 7. शाकटायान 8. शाकल्य 9. सेनक 10.स्फोटायन आदि। व्याकरण निर्माण की प्रक्रिया के प्रमुख तीन कारण माने जाते हैं 1.प्राकृतिक 2.धार्मिक 3. सांस्कृतिक और व्यावहारिक। लेकिन संस्कृत व्याकरण की उत्पत्ति धार्मिक कारण ही माना गया है।

पाणिनि के अष्टाध्यायी के उपरांत और पतंजली के पूर्व कई वर्तिककार हुए जिसमें उक्त, अनुक्त और दुरूक्त तत्थों पर विचार किया गया हो, उसे वर्त्तिक कहते है (पेज-५१) जिनमें कात्यायन, भारद्वाज, सुनाग, कोष्टा और वाडव के ही नाम प्रमुख रूप से प्राप्त होते हैं। इन वर्तिककारों ने पाणिनि के दिए सूत्रों पर विमर्श करते हुए उनका तुलनात्मक अध्ययन किया है। इन वर्त्तिककारों के उपरान्त ’भाष्य’ एवं ’महाभाष्य’ लिखना आरंभ हुआ। कई विद्वानों का मानना है कि पतंजली के ’महाभाष्य’ से पूर्व भी कई ’भाष्य’ लिखे गए परंतु पतंजली द्वारा लिखा गया ’भाष्य’ अन्य भाष्यकारों की तुलना में अधिक विस्तृत स्पष्ट एवं प्रामाणिक साबित हुआ जिसके चलते पतंजली के ’भाष्य’ को ’महाभाष्य’ नाम प्राप्त हुआ। इसी के कारण पाणिनि, कात्यायन और पतंजली के व्याकरणिक कार्य के कारण ही उन्हें ’मुनित्रय’ नाम से जाना जाता है, और इसके उपरान्त टीका का स्थान आता है। संस्कृत में टीकाकारों का विशेष स्थान है, इन टीकाकारों का काम होता था अधिक-से-अधिक सूक्ष्मता प्रदर्शित करना। इस कारण भाषाशास्त्रीय रुप से विवेचन करने के लिए इन टीकाकारों का विशेष स्थान था। इन टीकाकारों में श्वोभूति, व्याडि, कुणि, माथुर, वर्रुचि, देवनन्दी(शब्दावतारन्यास), दुर्विनीत,(शब्दावतार), चुल्लिभट्ट, निर्लूर, चूर्णि, जयादित्य-वामन(काशिका), भागवृत्तिकाकार, भत्रीश्वर, भट्ट जयन्त, केशव, इन्दुमित्र, मैत्रेयरक्षित(दुर्घटवृत्ति), पुरुषोत्तमदेव, शरणदेव, भट्टोजिदीक्षित(शब्दकौस्तुभ), अप्पयदीक्षित(सूत्रप्रकाश), नीलकण्ठ वाजपेयी(पाणिनीयदीपिका), अन्नम्भट्ट(पाणिनीय मिताक्षरा), विश्वेश्वर सूरि(व्याकरण सिद्धांत-सुधानिधि), दयानन्द सरस्वती(अष्टाध्यायी-भाष्य) आदि नाम प्राप्त होते हैं। जिस प्रकार अष्टाध्यायी के टीकाकार हुए उसी प्रकार ’महाभाष्य’ के भी टीकाकार हुए जिनमें भर्तुहरि, कैयट और नागेश भट्ट आदि प्रमुख हैं। टीकाकारों के उपरान्त कौमुदीकारों ने संस्कृत व्याकरण में कार्य किया जिन्होंने पाणिनि के “अष्टाध्यायी” के सूत्रों पर ही आश्रित किन्तु उसके क्रम से भिन्न, प्रक्रिया क्रम से सूत्रों को सजाकर रखने वाले को ’प्रक्रियाकार’ या ’कौमुदीकार’ कह सकते हैं। यह कार्य केवल पाणिनि द्वारा लिखित “अष्टाध्यायी” को लोकरुची योग्य बनाने के लिए तथा उसके प्रचार में वृद्धि करने के लिए किया गया। जिसमें प्रमुख रुप से आचार्य धर्मकीर्ति, विमल सरस्वती रामचन्द्र, भट्टोजिदीक्षित आदि हैं। इनमें भट्टोजिदीक्षित को सर्वाधिक प्रसिद्ध माना गया है। इन्होंने सिद्धान्त-कौमुदी नाम्नी प्रयोग क्रमानुसारी की व्याख्या लिखी। इन्हीं के साथ ज्ञानेन्द्र सरस्वती, नीलकण्ठ वाजपेयी, रामानन्द, नागेशभट्ट, रामकृष्ण रंगनाथ यज्वा, वासुदेवदीक्षित, कुणमित्र तिरुमला द्वादशाघ्याज आदि प्रमुख हैं।

पाणिनि और उनके कार्यों पर काम करने वाले व्याकरणशास्त्रीयों के साथ ही कुछ संप्रदाय संस्कृत व्याकरण के लिए काम कर रहे थे। जिन्हें पाणिनीयेतर संप्रदाय कहा गया। इनका प्रमुख प्रयास यह रहा की जो लोग अधिक श्रम न करके संस्कृत सीखना चाहते थे उनके लिए सामान्य व्याकरण का निर्माण करना। इन संप्रदायों में प्रमुख रुप से १.कातन्त्र-संप्रदाय २.चान्द्र-संप्रदाय ३.जैनेद्र-संप्रदाय ४.शकटायन-संप्रदाय ५.भोजदेव-संप्रदाय ६.हेम-संप्रदाय ७.सारस्वत-संप्रदाय ८.वोपदेव-संप्रदाय ९.जौमर-संप्रदाय १०.सौपद्य-संप्रदाय इन संप्रदायों में कई व्याकरणकार हुए।

इन संप्रदायों के साथ ही लेखक ने अख्यात पाणिनीयेतर संप्रदाय और गौण पाणिनीयेतर सम्प्रदाय के संबंध में भी चर्चा की है। इस प्रकार देखा जाए तो संस्कृत व्याकरण की परम्परा को विश्व की किसी भी भाषा के व्याकरण परम्परा से सर्वाधिक सशक्त, वैज्ञानिक एवं ऐतिहासिक माना जाता है, इसका श्रेय भी पाणिनि को ही दिया जाता है। लेखक ने एक जगह बहुत ही स्पष्ट रूप से लिखने का प्रयास किया है कि लगभग 400 वर्षों तक व्याकरण अध्ययन की यही प्रणाली देश में प्रचलित रही। इस बीच अष्टाध्यायी के क्रम से व्याकरण अध्ययन की प्रणाली प्राय: लुप्त-सी रही। किन्तु उन्नीसवी शताब्दी के अन्त में स्वामी विरजानन्द एवं उनके शिष्य स्वामी दयानंद सरस्वती ने फिर अष्टाध्यायी के क्रम से व्याकरण अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया था।

2. प्राकृत एवं अपभ्रंश व्याकरण की परंपरा:- पाश्चात्य व्याकरण परंपरा संस्कृत व्याकरण की परंपरा की तरह नहीं रहीं। इसका कारण है कि प्राकृत, संस्कृत के समान कोई एक भाषा नहीं थी, प्रत्युत उसके अनेक प्रान्तीय भेद थे; जिनमें व्याकरणिक दृष्टि से समानता कम और भिन्नता ही अधिक थी।(पृष्ठ-९५) इसके बावजूद प्राकृत वैयकरणों में प्रमुख रुप से निम्न वैयाकरणों को व्याकरणशास्त्रीयों के रुप में जाना जाता है। वररुचि : प्राकृत के उपलब्ध स्वतन्त्र एवं व्यवस्थित व्याकरणों में वरुचि-कृत ’प्राकृत प्रकाश’ सर्वाधिक प्राचीन है। इनका पूरा नाम वररुचि कात्यायन है। (पृष्ठ-९९) इन्हीं के साथ चण्ड (प्राकृतलक्षणम्), पुरुषोत्तम (प्राकृतनुशासन), हेमचन्द्र(सिद्ध हेम शब्दानुशासन), क्रमदीश्वर(संक्षिप्तसार), त्रिविक्रमदेव(प्राकृत शब्दानुशासन), सिंहराज, लक्ष्मीधर(षड्भाषाचन्द्रिका), अप्पयदीक्षित(प्राकृत मणिदीप), मार्कण्डेय(प्राकृत सर्वस्व), रामवर्कवागीश(प्राकृत कल्पतरु) इन वैयाकरणों के साथ ही नरसिंह, शुभचन्द्र, कृष्ण, वामनाचार्य आदि उल्लेखनीय हैं। देखा जाए तो प्राकृत वैयाकरणों में भी संस्कृत की तरह ही प्राकृत में व्याकरण लिखने का प्रयास किया लेकिन संस्कृत वैयाकरणों की तरह वे प्रसिद्ध एवं वैज्ञानिक सिद्ध नहीं हो सके। इनके उपरान्त लेखक ने अपभ्रंश वैयाकरणों की चर्चा की है। जिसमें यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि जो प्राकृत वैयाकरण रहें उन्होंने ही अपने ग्रंथों के एक-एक पाठ में अपभ्रंश व्याकरण की चर्चा की। जिसे ग्रियर्सन के उद्धरण से स्पष्ट किया है कि ग्रियर्सन ने त्रिविक्रम, लक्ष्मीधर, सिंहराज, अप्पयदीक्षित, इत्यादि को प्राकृत-वैयाकरणों का पश्चिमी सम्प्रदाय स्वीकार किया है तथा प्राच्य सम्प्रदाय का प्रवर्तक वररुचि को माना है। इससे स्पष्ट है की अपभ्रंश की भी अपनी कोई विशेष परंपरा नहीं रही। जिन प्राकृत वैयाकरणों ने अपभ्रंश व्याकरण पर चर्चा की उनमें रामतर्कवागीश का नाम उल्लेखनीय माना गया है।

३.पाश्चात्य व्याकरण लेखन:-

पाश्चात्य व्याकरण लेखन की परंपरा लैटिन के व्याकरण लेखन की परंपरा से आरंभ होती है लेकिन इस अध्ययन को यूरोपीय पादरियों के सहयोग के बिना महत्व प्राप्त नहीं हो सका। जिसमें अरस्तु से लेकर अलेक्जेंण्डर, फेर्रों, प्रीसियन के काल को आदिकाल(५००ई.पू.से १६०० ई.) के रुप में माना है और “अरस्तु पाश्चात जगत के व्याकरणशास्त्र में जन्मदाता के रुप में विख्यात हैं”(पृष्ठ-११५) मध्यकाल में लेवनिज, जोहन गॉट फ्रेड हर्डर, जोनिश आदि ने काम शुरु किया लेकिन इस बीच महत्वपूर्ण बात यह रही की हर्डर ने यह घोषणा की कि “भाषा न तो ईश्वर-प्रदत्त है और न उसे मनुष्य ने अपनी इच्छा से रचा है, अपितु वह अवश्यकता के परिणामस्वरुप मनुष्य की प्रकृति से उसी प्रकार सामान्य एवं स्वाभाविक रुप से निकल पड़ी जिस प्रकार गर्भ से शिशु।” इस काल के विद्वानों ने माना है कि संस्कृत की खोज १९वीं शताब्दी में पाश्चात्य व्याकरणशास्त्र में महत्वपूर्ण घटना रहीं। उनका यह भी मत है की बगैर संस्कृत जाने भाषाशास्त्र का अध्ययन करना अपूर्ण साबित होगा। इस कथन को विलियम जोन्स ने यह कहकर अधिक प्रोत्साहन दिया कि संस्कृत, ग्रीक से भी अधिक पूर्ण, लैटिन से भी अधिक पुष्ट तथा दोनों की अपेक्षा अधिक परिष्कृत है।

आधुनिक काल(१८०० से वर्तमान) इस काल में श्लेगल बन्धुओं के बाद डेन विद्वान रैस्मस क्रिश्चियन रास्क ने(आइसलैण्डिक ग्रामर) लिखा और यह रैस्मस क्रिश्चियन का ही कथन रहा की द्रविड़(मालावारिक) संस्कृत परिवार से भिन्न है। इन्हीं के साथ याकोब ग्रीम(देवभाषा व्याकरण), फ्रान्स बॉप ने (संस्कृत, जेन्द,ग्रीक, लिथुआनी, गाथी एवं जर्मनभाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन) ग्रंथ लिखे। इन तीन विद्वानों को आधुनिक भाषाशास्त्र के संस्थापकत्रय माना गया। इन्हीं के साथ पॉट, रैप, नथा ब्रेड्सफोर्ड के नाम भी आते हैं। इसके उपरान्त १९वीं शताब्दी का उत्तरार्थ शुरू होता है जिसमें ऑगुस्त श्लाइखर(१८२१-१८६८ ई.) ने “ ’ए कम्पेण्डियन ऑफ कम्पेरेटिव ग्रामर ऑफ इण्डोयूरोपियन लैग्वेज’(१८६१ई.)” लिखा। इसी काल में जॉर्ज कुर्टिउस, विलियम ड्वाइट व्हिट्नी, और फ्रेडरिख मैक्समूलर भी हुए। १९वीं शताब्दी का अन्तिम चरण १८७० ई. के आसपास से माना जाता है। इस काल के वैयाकरणों ने जब कार्य आरंभ किया तो प्राच्यवादी वैयाकरणों ने उन्हें “नौसिखिए वैयाकरण” कहकर उनका उपहास किया। लेकिन बाद में इस काल के वैयाकरणों के कार्य से प्राच्यवादी वैयाकरण अपने-आप पीछे छूट गए। इसी काल में हेनरी स्वीट, ब्रील, ऑटो जस्पर्सन, बुण्ट, मूलर आते हैं। ब्रील द्वारा लिखित अंग्रेजी-भाषा का ऐतिहासिक व्याकरण” महत्वपूर्ण है।

२०वीं शताब्दी को वर्णनात्मक एवं संरचनात्मक भाषा का स्वर्णयुग कहना गलत न होगा। इस काल में फर्डिनेण्ड दि सस्सूर(कोर्स दि लिग्विस्टिक जनराले) महत्वपूर्ण है। इनके उपरान्त लियोनार्ड ब्लूमफिल्ड(सन१८५७-१९४५ई.) ने लैंग्वेज(भाषा) नामक ग्रंथ लिखा, जिसे भाषाविज्ञान का ’बायबिल’ भी कहा गया। साथ ही फेज बॉस, एडवर्ड सपीर (फोनेटिक,१८९९ई) ने जस्पर्सन (हिस्टोरिकल इग्लिश ग्रामर) ग्रंथ लिखे। इसके उपरान्त वर्णनात्मक भाषाविज्ञान में कार्य आरंभ हुए। लेकिन अब यह कार्य स्कूलों के माध्यम से होने लगे थे। जिसमें प्रमुख स्कूल इस प्रकार है। १.लन्दन स्कूल - जिसमें डेनियल जोन्स, इडा कोरोलिन, ट्रिम, हाउस ट्रोल्डर, बर्टेल पेज आदि थे। २.अमरीकी स्कूल- इस स्कूल के आदर्श सपीर और ब्लूम फिल्ड थे। साथ ही ब्लाक, ट्रेगर, पाइक, नायडा, हॉकेट, ग्लीसन, जेलिग हैरिस, नोम चॉम्स्की, आर्चिवल्ड, ए.हिल, रॉबर्ड ए.हॉल आदि थे। ३. प्राग स्कूल- इस स्कूल के आदर्श सस्यूर थे। इस स्कूल के प्रमुख थे ट्रेबे स्कॉय, जॉकोब्सन, हैले, फाण्ट, मार्टिन, मैथियस आदि। ४.कोपेन हेगन स्कूल- इस स्कूल के संस्थापक जेल्मस्लेव एवं उल्डाल है। इस स्कूल को ग्लासमैटिक स्कूल भी कहा जाता है। इस प्रकार देखा जाए तो अंग्रेजी व्याकरणशास्त्र की परंपरा भी समृद्ध ही रही है। जिसमें समय के अनुसार भारी बदलाब भी किए गए। जिसके कारण आधुनिक व्याकरण शास्त्र की परंपरा में अंग्रेजी व्याकरण आज भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। डॉ.अनन्तनाथ चौधरी का यह कार्य इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि इसमें हिंदी और संस्कृत व्याकरण के इतिहास के साथ ही पाश्चात्य व्याकरण का भी विस्तृत वर्णन किया गया है। अंगेजी व्याकरण में भाषा प्रौद्योगिकी की शुरुआत बड़े रुप में हो चुकी है जिसका महत्वपूर्ण कार्य १९७०-८० के बाद ही शुरू होता है अत: इस पुस्तक में इस चर्चा का अभाव है।

हिन्दी-व्याकरण का इतिहास: एक पुनरावलोकन

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हो रहा है, इस पुस्तक में डॉ० अनन्त चौधरी ने हिन्दी भाषा के लिये लिखे गये व्याकरण का इतिहास प्रस्तुत किया है। यह वास्तव में, जैसा कि लेखक खुद कहते हैं, कि एक श्रमसाध्य एवं व्ययसाध्य कार्य लगता है। प्रस्ताविक अंश में उन्होंने संस्कृत व्याकरण शास्त्र की और पाश्चात्य व्याकरण शास्त्र की परम्पराओं का एक विस्तृत परिचय प्रदान किया है। हिन्दी व्याकरण के इतिहास को उन्होंने अधोलिखित भागों में प्रस्तुत किया है: १. आरम्भ काल (सन् १६७६-१८८५ ई०), २. विकास काल (सन् १८५५-१८७६ ई०), ३. उत्थान काल (सन् १८७६-१९२० ई०) , ४. उत्कर्ष काल (सन् १९२१-१९४७ ई०) तथा ५. नवचेतना काल (सन् १९४७ ई० के पश्चात्)। इन पांच कालखण्डों में वे सन् १६७६ से १९६६ तक के हिन्दी व्याकरण ग्रन्थों का परिचय देते हुए उनका प्रतिपाद्य प्रस्तुत करते हैं। इन कालखण्डों के नामकरण में लेखक ने “हिन्दी-व्याकरण के स्वरूप में क्रमिक रूप से होने वाले विकास को आधार बनाया है“ (पृष्ठ १५७)।

लेखक ने प्रत्येक काल के वैयाकरणिक कार्यों का आधार, उद्देश्य, पद्धति, एवं आदर्श की दृष्टि से अध्ययन एवं मूल्यांकन किया है। प्रत्येक काल के बारे में विस्तृत रूप से चर्चा करने से पहले वह विवेच्य काल का सामान्य परिचय एवं उस समय हिन्दी की प्रयोजन मूलक स्थिति के बारे में भी बताते हैं। तत्युगीन सभी ज्ञात एवं महत्वपूर्ण वैयाकरणिक कार्यों पर प्रकाश डालने का लेखक का भरपूर प्रयास रहा। यद्यपि कुछ अप्रधान कार्य अवश्य परिगणित नहीं किये गये हैं।

प्रथम काल जो कि आरम्भ काल के नाम से है, में लेखक ने तत्कालीन उपलब्ध व्याकरण ग्रंथों का जो कि सभी विदेशी लेखकों द्वारा लिखे गये हैं, परिचय दिया है। इस काल के प्रमुख वैयाकरणों में जोहन जोशुआ केटेलर(हिन्दुस्तानी ग्रामर), जॉन फरगूसन(हिन्दुस्तान भाषा का व्याकरण, ५८-पृष्ठ), जॉन बॉर्थविक गिलक्राइस्ट(इंग्लिश-हिन्दुस्तानी कोष), जॉन सेक्सपियर(ए ग्रामर ऑफ द हिन्दुस्तानी), सैण्डफोर्ड आर्नोट(हिन्दुस्तानी ग्रामर) तथा डङ्कन फोर्बेस(ए ग्रामर ऑफ हिन्दुस्तानी ग्रामर) परिगणित हैं। ये सीमित प्रयोजनों के लिये एक विदेशी भाषा के व्याकरण थे। वैयाकरणों का हिन्दी-ज्ञान सीमित था। उन्हें हिन्दी के स्वरूप, प्रवृत्ति एवं प्रकृति की वास्तविक परख नहीं थी। इस कारण वे चाहकर भी हिन्दी का व्यवस्थित व्याकरण लिखने में असमर्थ थे। ये व्याकरण विदेशी भाषाओं के व्याकरण की तर्ज़ पर लिखे गये थे। इन विद्वानों के साथ ही पादरी एम.टी.आदम का ’हिंदी-भाषा का व्याकरण’ सन १८२७ ई. में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ था। वे हिन्दी-भाषा में हिन्दी का व्याकरण लिखने वाले प्रथम वैयाकरण थे।(पृष्ठ-२२६)

विकास काल के प्रमुख वैयाकरण पं० श्रीलाल(भाषा चन्द्रोयल,१८५५), पं० रामजसन (भाषात्त्वबोधिनी,१८५८ई.), सर मोनियर विलियम्स(रुडिमेण्ट्स ऑफ ग्रामर), शीतल प्रसाद गुप्त(शब्दप्रकाशिका), विलियम एथरिङ्गटन(स्टूडेण्टस ग्रामर ऑफ हिन्दी लैड्ग्वेज), जॉन डाउसन, एम० आर० ए० एस०, जॉन बीम्स, दामोदर शास्त्री(भाषादर्श-बालव्याकरण(१८७४)) तथा राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द(हिंदी व्याकरण,१८७५) हैं। इस कालमें पहली बार देशी वैयाकरण हिन्दी-व्याकरण लिखने में रुचि दिखाते हैं। यह काल विशेष रूप से पहली बार एक भारतीय विद्वान द्वारा हिन्दी-व्याकरण लिखने के लिए जाना जाता है। पं श्रीलाल का “भाषा-चन्द्रोदय” सन् १८५५ ई० में प्रकाशित हुआ था, जो आधार, उद्देश और आदर्श, तीनों दृष्टियों से विदेशी विद्वानों के द्वारा लिखित आरम्भकाल के व्याकरणों से भिन्न प्रकार का था। इस व्याकरण में व्याकरण की परिभाषा, तथा देवनागरी की वर्णमाला का परिचय दिया गया है। स्वर एवं व्यञ्जनों का सूक्ष्म विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इसमें आठ कारक माने गये हैं एवं कारक चिह्नों को विभक्ति प्रत्यय कहा गया है। इस काल के अधिकांश वैयाकरण भारतीय थे जिन्होंने संस्कृत-व्याकरण को आधार बनाकर हिन्दी-व्याकरण की रचना की थी। आरम्भ काल के वैयाकरणों ने जहाँ विदेशी भाषाओं में हिन्दी-व्याकरणों की रचना की, वहां विकास काल में अधिकांश हिन्दी-व्याकरण हिन्दी भाषा में लिखे गये।

उत्थान काल के व्याकरणों में ऐतिहासिक स्रोत के संकेतों से संवलित तुलनात्मक पद्धति के आधार पर भाषा के विश्लेषणात्मक विवेचन का प्रारम्भ हुआ, जो सर्वप्रथम केलॉग के व्याकरण में प्रत्यक्ष हुआ। एस्० एच्० केलॉग(हिन्दी भाषा का व्याकरण,१८८३), अयोध्याप्रसाद खत्री(हिंदी व्याकरण), केशवप्रसाद, पं० मदनमोहन, जॉर्ज ए० ग्रियर्सन, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र(प्रथम हिन्दी व्याकरण, १८८४), बाबू रामचरण सिंह(भाषा प्रभाकर,१८८५) इन्होंने कर्ता की परिभाषा इस प्रकार की कर्त्ता उसे कहते हैं, जिसमें व्यापार हो, अर्थात् जो क्रिया को करे। इन्ही के साथ पंअम्बिका व्यास, देवीदयाल, गोकुल प्रसाद, एडविन ग्रीव्स(ग्रामर ऑफ मॉडर्न हिंदी, १८८५), राजाराम, माधवप्रसाद पाठक(हिंदी बालबोध व्याकरण), श्यामसुन्दर दास(ऐन एलिमेण्टरी ग्रामर ऑफ हिन्दी ऐण्ड उर्दू, १९०६), बाबू गंगाप्रसाद, पं.कन्हैयालाल उपाध्याय(हिंदी व्याकरण प्रवेशिका,१९१०), चतुर्वेदी द्वारका प्रसाद शर्मा(हिंदी व्याकरण शिक्षा,१९१२), पं.रामदहिन मिश्र(प्रवेशिका हिन्दी व्याकरण, १९१८ई.) तथा पं अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी(हिन्दी कौमुदी,१९१९ ई.) इस किताब में वाजपेयी ने वर्ण,शब्द, और वाक्य रचना पर प्रमुख रुप से विचार किया है। इस प्रकार देखा जाए तो डॉ.अनन्तनाथ चौधरी जी ने इन प्रमुख वैयाकरणों के साथ अन्य वैयाकरणों का भी परिचय दिया हैं।

उत्कर्षकाल के प्रमुख वैयाकरण पं० कामताप्रसाद गुरु के संबंध में लिखा है कि इन्होंने हिंदी व्याकरण से संबंधित प्रमुख चार पुस्तकें लिखीं (भाषा वाक्य पृथक्करण,सन.१९००, हिंदी बालबोध व्याकरण, सहज हिन्दी रचना, हिंदी व्याकरण, सन.१९२०ई.) इनमें हिन्दी व्याकरण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। शिवनारायण लाला, अमृतलाल दासगुप्ता, बी० एल० जैन चैतन्य, देवीप्रसाद वर्मा, सुरेश्वर पाठक विद्यालंकार(व्याकरण मयड्क,१९२६ई.), मुहिउद्दीन क़ादरी(हिन्दुस्तानी फोनेटिक्स,सन१९३०ई.), सत्यप्रकाश, धीरेन्द्र वर्मा और बाबूराम सक्सेना(नवीन हिन्दी व्याकरण,१९३३), गणेशप्रसाद द्विवेदी, रघुनाथ दिनकर काणे(व्याकरण प्रवेशिका, १९३८), गोपाल शास्त्री(हिन्दी दीपिका), ललितचन्द्र रैना, रघुनाथ, केदारनाथ शर्मा, आत्माराम, सत्यजीवन वर्मा, रामचन्द्र वर्मा(मानक हिन्दी व्याकरण), नरदेव विद्यालंकार(राष्ट्रभाषा का सरल व्याकरण, १९४७) इत्यादि हैं। हिन्दी व्याकरण का उत्कर्षकाल का आरंभ ही कामता प्रसाद गुरु के व्याकरण से होता है। इस व्याकरणिक ग्रंथ का आज भी महत्वपूर्ण स्थान है।

नवचेतना काल के प्रमुख वैयाकरणों में किशोरी दास वाजपेयी(ब्रजभाषा का व्याकरण, सन.१९४३ई.),(हिन्दी-शब्दानुशासन,१९५८) का नाम सर्वप्रथम आता है। इन्होंने ही इस बात की घोषणा की कि हिन्दी एक स्वतन्त्र भाषा है, वह संस्कृत से अनुप्राणित अवश्य है, जैसा अन्य भारतीय भाषाएँ है परन्तु वह अपने क्षेत्र में सार्वभौम सत्ता रखती है।”(पृष्ठ-५५७), इनके उपरान्त शिवपूजन सहाय, दुनीचन्द, आर्येन्द्र शर्मा, ज० म० दीमशित्स हैं। इस काल में किशोरीदास वाजपेयी नवीन चेतना का अग्रदूत बन कर आये। इस काल की चर्चा में डॉ.अनन्तनाथ चौधरी ने किशोरी दास वाजपेयी के ग्रंथ का विस्तृत वर्णन किया है। साथ ही अन्त में लगभग १००-१२० हिन्दी व्याकरण के ग्रंथों की सूची दी है जिससे स्पष्ट होता है कि इस काल में अन्य हिन्दी व्याकरण लेखन की तुलना में अधिक कार्य हुआ है। जिसे उल्लेखनीय ग्रंथ और छात्रोपयोगी व्याकरण नाम से विभाजीत किया गया है। इस प्रकार देखा जाए तो डॉ.अनन्तनाथ चौधरी जी का कार्य अतुलनीय है।

व्याकरण उस शास्त्र का नाम है, जिसमें भाषा के अंगप्रत्यंग का पूर्ण विवेचन किया जाता है(पृष्ठ-५५२) आधुनिक व्याकरण लेखन ने इसी परिभाषा का स्वीकार कर व्याकरण को किसी भाषा या क्षेत्र तक सीमित नहीं रखा। इसका विस्तार वैश्विक रुप में किया। जिसमें भाषाविज्ञान के अधिकतर घटकों को ध्यान में रखकर विचार किया जा रहा है। यह कार्य प्रमुख रुप से संगणक को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। जिन व्याकरणों की स्थापना आधुनिक व्याकरण में हुई है उन व्याकरणों को संगणकीय भाषा प्रौद्योगिकी क्षेत्र में उपयोग में लाने का अवश्य प्रयत्न किया गया। जिसमें Transformational grammar (TG), Systemic functional grammar (SFG), Principles and Parameters Theory (P&P), Lexical-functional Grammar (LFG), Generalized Phrase Structure Grammar (GPSG), Head-Driven Phrase Structure Grammar (HPSG), Dependency grammars (DG), Role and reference grammar (RRG), इनमें कुछ ऐसे व्याकरण भी रहे हैं जिनकी स्थापना केवल संगणकीय उपयोग के लिए ही की गई है। आधुनिक व्याकरण निर्माण में केवल पाश्चात्य विद्वान ही काम नहीं कर रहे हैं बल्कि भारतीय वैयाकरणों ने भी इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया है। कई विद्वान संस्कृत व्याकरण का उपयोग कर संगणकीय कार्यक्रम तैयार करने में जुटे हुए हैं। इस कार्य में हिंदी व्याकरण की भूमिका अधिक नहीं है। व्याकरण के बदलते स्वरुप के कारण हिंदी भाषा के लिए निर्माण किए जा रहे भाषिक संसाधनों के लिए भी पाश्चात्य भाषाओं के लिए बनाए गए व्याकरणों का उपयोग भी किया जा रहा है। डॉ.अनन्तनाथ चौधरी की “हिंदी व्याकरण का इतिहास” पुस्तक उन विद्वानो को यह सोचने पर जरुर सहायक होगी। क्योंकि इस पुस्तक में हिंदी में अबतक हुए अधिकतर वैयाकरणों के पुस्तकों की सूची दी गई है। जिसका उपयोग कर आधुनिक वैयाकरण हिंदी के लिए जब भाषिक संसाधन निर्माण करने के लिए सोचेंगे तो इस पुस्तक में दिए गए वैयाकरणों के हिंदी व्याकरण पर चर्चा करने का एक अवसर प्रदान करेगी। वैसे देखा जाए तो यह पुस्तक “हिंदी व्याकरण का इतिहास दिखाने के लिए” पूर्ण हैं लेकिन यह पुस्तक बहुत समय पूर्व लिखी गई है। जिसके कारण १९६६ के बाद का व्याकरणिक इतिहास इसमें नहीं मिल पाता। अत: यह कार्य पूर्ण करने का एक अवसर नवीन व्याकरणिक अनुसंधान कर्ताओं के पास है। जिससे भविष्य में हिंदी व्याकरण की संपूर्ण पुस्तक हिंदी पाठकों को उप्लब्ध हो सके।

संदर्भ : -

1. हिंदी व्याकरण मीमांसा, काशीराम शर्मा, 1996, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली

2. हिंदी व्याकरण का इतिहास, डॉ.अनन्त चौधरी, 1972, बिहार हिंदी प्रकाशन

अकादमी, पटना

3. प्राकृत व्याकरण, आचार्य श्री मधुसूदन प्रसाद मिश्र, विद्याभवन राष्ट्रभाषा ग्रंथमाला, वाराणसी

4. हिंदी भाषा व्याकरण और साहित्य को पाश्चात्य विद्वानों को पाश्चात्य विद्वानों की देन, कौशल्या

भावनानी, 1994, पराग प्रकाशन, नई दिल्ली

5. संस्कृत व्याकरण का इतिहास, लेखक-आचार्य श्री युधिष्ठिर मीमांसक, संपादक-रामनाथ त्रिपाठी

शास्त्री, 2003, चौखम्भा पब्लिशर्स, वाराणसी

6. मराठी व्याकरण: वाद प्रवाद, कृष्ण श्री.अर्जुन वाडकर, 1987, सुलेखा प्रकाशन, पुणे

7. पाणिनीय व्याकरण आणि भाषा तत्वज्ञान(मराठी), पंडित वामनशास्त्री बा.भागवत, 1985 महाराष्ट्र राज्य

साहित्य आणि संस्कृति मंडळ, मुंबई

8. हिंदी का समसामायिक व्याकरण, यमुना कचरू, 1980, मैकमिलन इंडिया प्रेस, मद्रास

9. व्याकरण: सैद्धांतिक विवेचन और व्यावहारिक संदृष्टि, संगोष्ठी विवरण

(पुस्तिका), 1979, केन्द्रीय हिंदी संस्थान, हैदराबाद

10. हिंदी व्याकरण, कामताप्रसाद गुरु, 1977, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी

11. शास्त्रीय मराठी व्याकरण(मराठी), मोरो केशव दामले, केशव भिकाजी ढवले,1925, ठाकुर

द्वार, मुंबई

कांबले प्रकाश अभिमन्यु,

पी.एच.डी.हिंदी अनुवाद

माधव गोपाल,

जे.एन.यू.नई दिल्ली-६७

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1 comment:

ken p said...

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